स्वामी विवेकानंद के तेज दिमाग का रहस्य |
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नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे ब्लॉग में आज हम ऐसे महान इन्सान के बारे में बात करने वाले है जिसको कई सारे लोग उनको अपना गुरु मानते है उनके कहानी और किस्सों से पता चलता है की वह कितने महान है हमारे जीवन को कोई एक इन्सान तो ऐसा होता है जिसको पढ़ कर और देख कर हमने अपना जीवन उनकी तरह करने की कोशिश जरुर की होंगी आपके जीवन में भी कोई इन्सान ऐसा होंगा जिस की वजह से आप सफल है या सफल हो रहे है में किस इन्सान की बात कर रही हु यह आपको एक लाइन सुन कर जरुर पता चल जायेगा.
उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष न मिले |
"उठो जागो और जब तक लक्ष पूरा न हो तब तक महेनत करते रहो" आप को यह लाइन पढ़ कर ख्याल आही गया होंगा की में महान इन्सान स्वामी विवेकानंद के बारे में बात कर रही हु एक बार उन्होंने चिकागो में अमेरिका में भाषण दिया था उस भाषण के बाद सात हजार लोगो ने खड़े होकर तालिय बजाई थी स्वामी विवेकानंद को भारत के युवा सन्यासी भारत के गुरु स्वामी विवेकानंद ने चिकागो में धर्म के लिए भाषण दिया था स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेन था उनका पूरा नाम था नरेन् नाथ दत्त जो की स्वामी विवेकानन्द उनका जन्म १२ जनवरी १८६३ इनके जन्म दिन पर नेसनल यूथ दिन को हम मानते है इन महान इन्सान को महाभारत, रामायण, वेद, पूराण, भगवत गीता यह सारा ज्ञान था रामकृष्ण मिशन की उन्होंने स्थापना की है उन्होंने अपने जीवन में हमेशा अपने जीवन में समाज सेवा और लोगो की मदद करने में ही अपना जीवन पूर्ण किया है |
इन सब बड़े इन्सान के गुरु थे स्वामी विवेकानंद |
स्वामी विवेकानंद जमशेद जी टाटा के गुरु भी थे स्वामी विवेकानंद ने हमारी देश की संस्कृति को पूरी दुनिया में फेलाया है स्वामी विवेकानन्द कितने स्मार्ट है यह भी जान लेते है जब स्वामी विवेकानंद छोटे थे तब उसके घर के बहार चंपा का पेड़ था जिस पर वो और उसके मित्र डाली के ऊपर चढ़ कर जुलते थे और यह पेड़ की बोहोत ही ज्यादा कमजोर आती है और बचपन में वह बोहोत ही ज्यादा सरारती थे तो एक दिन उसके पिताजी ने उन सब बच्चो को बुला कर कहा की इस पेड़ पर मत लटकना यहाँ पर भूत आता है अगर तुम इस पेड़ की डाली को तोडोंगे तो भूत आकर तुम्हारी गर्दन को मोडेंगे यह सुन कर सरे बच्चे भाग गए और वह खेलने नहीं आते थे लेकिन स्वामी विवेकानंद अगले दिन भी वह डाली से लटक कर खेल रहे थे उसके मित्रो ने आकर पुछा की यहां मत लटको यहाँ पर भूत आकर तुम्हारी गर्दन को मोड़ेगा तो स्वामी विवेकानंद ने कहा की हम कितने दिनों से यहां खेल रहे है अगर भूत होता तो आब तक हमारी गर्दन को मोड़ चूका होता पिताजी हमें यहां खेलने नहीं देना चाहते इसी लिए ऐसा कह रहे है तो काम उम्र में भी स्वामी विवेकानंद की बुध्धि इतनी तेज थी |
कितना तेज दिमाग था उनका जान लीजिये हैरान रह जायेंगे |
एक बार क्या हुआ जो राम कृष्णा उनके गुरु थे उसने सब शिष्यों को ऐसा कहा की आप सबको अपने अपने घर में कसे एक मुठ्ठी चावल की लानी है वह भी ऐसे लानी है की कोई तुम्हे देखे नहीं फिर सभी शिष्य एक मुठ्ठी चावल लेकर आ गए वह भी चुप कर कोई भी देखे नहीं ऐसे लेकिन स्वामी विवेकानंद ऐसे ही खाली हाथ आ गए उनके हाथो में कोई भी चावल नहीं थे तो गुरु जी ने पुछा की तुम कुछ क्यों नहीं लाए तो स्वामी विवेकानंद ने कहा की आपने कहा था की कोई भी देखे नहीं ऐसे लाना है पर मैं तो ऐसा मानता हु की भगवान हमें हर वक्त देखता है तो मुझे तो भगवान देखता है तो में कैसे चावल लाता बचपन से ही इनके विचार बोहोत ही ज्यादा दुसरो के मुकाबले बोहोत ही बढ़िया थे |
स्वामी विवेकानंद के पिताजी का जब देहांत हो गया तो वह बोहोत ही ज्यादा दुखी थे उसके घर की हालत बोहोत ही ज्यादा ख़राब थी वह बोहोत ही गरीब थे वह पूरी तरह से टूट चुके थे उसका परिवार पूरी तरह से टूट चूका था गरीबी में डूब गए थे पिता के देहांत में इतनी गरीबी हो गयी थी की पूरी तरह से खाना भी नहीं मिल रहा था कई बार तो वह ऐसा भी करते थे की वह लोग खाना खाने बैठते थे तो वह कभी कभी बोल देते थे की में भंडारे में खाना खाकर आया हु मुझे बिलकुल भूख नहीं है ऐसा कह कर वह खाना नहीं खाते थे और अपने परिवार को खाना खिलाते थे इसको बचपन से ही ऐसा भाव था की मुझे सबकी सेवा करनी है इनका फोकस बोहोत ही बढ़िया था वह पढ़ रहे थे और उसके समाने से ही पूरी की पूरी बारात चली गयी और उनको पता भी नहीं चला कितने सारे लोगो ने पूछा की कोई बारात निकली है यहाँ से तो उन्होंने मना कर दिया इतना जय ध्यान था उनका किसी भी चीज में वह पढाई में इतना खो गए थे की उनको पता ही नहीं था की यहाँ से कोई बारात निकली है ऐसा भयंकर केंद्र था इनका की जो काम करते थे उअसमे ही अपना मन लगा रहता था कोई और चीज हो रही होती है तो इनको पता नहीं चलता था |
एक दिन हुआ ऐसा की यह बेहोश मिले और लोगो ने इनको पानी दल कर जगाया तो इन्होने बताया की में तिन दिन और तिन रातो सो यहाँ पर पढ़ रहा हु मुझे आ तो खाना याद आया और नहीं और कुछ वह इतने मशगुल हो गए थे पढाई में की उनको न तो खाना याद आया न तो कुछ और कमजोरी की वजह से वह बेहोश हो गए थे इतना ज्यादा वह खो जाते थे पढाई में उनको बताया की तिन दिन बिट गए तब उनको हकीकत समज आई वह इतना खो गए थे की उनको समय का भी पता न चला उन्होंने कई साडी किताबे पढ़ ली और इन्होने कहा भी है की उठो जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष प्राप्त न हो |
लोगो की सेवा और दया का भाव बचपन से था |
इनके अन्दर दया सका भाव बचपन से ही था जब इनकी माता सब्जिया काट ने बैठी तो वो वही पर पढ़ रहे थे तो उन की माँ ने कहा की बेटा चाकू मुझे देना वहां पर पड़ी है तो उनका ध्यान वह चाकू की धर पर पड़ा उन्होंने चाकू की धर वह हिस्सा पकड़ा और जो चाकू का पीछे का हिस्सा था वह अपने माता की और किया स्वामी विवेक नन्द जब चिकागो गए तो वह एक पुस्तकालय में जाया करते थे तो वह सुभाह किताब लेते थे और श्याम को किताब वापस करते थे जो पुस्तकालय में बित्ते थे वह हैरान हो जाते थे वह ऐसा बोलते थे की सुभाह किताब लेते हो और श्याम को दे देते हो पागल हो क्या जब पढना नहीं है तो मजा क्यों लेते हो समय क्यों ख़राब करते हो तो स्वामी जी बोले की में पढ़ लेता हु वह बोले इतनी मोती किताब सुभाह ली और श्याम तक पढ़ लेते हो तो उन्होंने बोला की में तेरा परिक्षण करती हु उन्होंने एक महीने की तिस किताबे उठाई और बोले की चलो में तुम्हारा परिक्षण करती हु तो उन्होंने सवाल पूछना सुरु कर दिया |
स्वामी जी ने न सिर्फ उसका उत्तर दिया बल्कि यह भी बता दिया की वह कोण से पन्ने में से सवाल पूछ रही है उस पन्ने का नंबर कितना है उसके अन्दर फोटोग्राफी मेमोरी जैसा दिमाग था कैसे हम फोटो देखते है वैसे ही उनको सब याद हो जाता था एक बार एक ब्रिटिश ने स्वामी जी से कहा की आप स्मार्ट इन्सान की तरह अच्छे कपडे पहनते हो तो आपके देश के अन्दर आपको दरजी जेंटल मेंट बनाता है और हमारे देश में हमारी सस्कृति में हमारा स्वाभाव हमें जेंटल मेंट बनाता है इनकी इच्छा शक्ति और बुध्धि यह दो चीज बोहोत ही जबरदस्त थी |
शिक्षक को भी समजाया शिक्षा का अर्थ |
यह अमेरिका में वहा की यूनिवर्सिटी में पढाई कर रहे थे वहा कुछ खाने गए थाली में भोजन लिया और खाने बैठ गए तो उस ही टेबल पर उसके शिक्षक थे तो वह बोहोत ही चिड गया और उन्होंने देखा की स्वामी विवेकानंद वह आकर बैठ गए है तो उसने कहा की सुवर हंस के पास नहीं बैठा करते ऐसा बोला स्वामी विवेकानंद मुस्कुरा के बोले सुवर हंस के पास नहीं बैठता तो वह बोला नहीं बैठता तो में उड़ जाता हु तो वह अपनी थाली लेकर वहां से लेकर चले गए सारे बच्चे हसने लगे और वह शिक्षक को बोहोत ही गुस्सा आया में उड़ जाता हु ऐसा स्वामी जी बोले मतलब स्वामी जी हंस हुए न यह तो शिज्षक की बजती हो गयी उसने सोचा की में इसकी भी बजती करता हु तू क्लास में आ तुजे देखता हु क्लास में जब पहुचे तो आगे बैठे थे शिक्षक ने उनको खड़ा किया और और बोले की अगर दो थैले मिले एक थैले में धन और एक थैले बुध्धि तो तुम कोन सा थैला उठाओंगे तो स्वामी विवेकानंद बोले की में धन वाला थैला उठाऊंगा तो शिक्षक बोले की देखा में तो पहेले ही कह रहा था तो स्वामी जी बोले आप कोन सा थैला उठाते तो शिक्षक बोले में बुध्धि वाला थैला उठाता स्वामी जी बोले ठीक बात है जिसके पास जो नहीं है वही उठायेंग ना फिर से सारे बच्चे हसने लगे |
शिक्षक को बोहोत ही गुस्सा आया तो उसने अगले दिन सबका टेस्ट ले लिया और फिर शिक्षक देख रहे थे सारी टेस्ट को और स्वामी जी की जो टेस्ट थी उसको पढ़ा नहीं और आखिर में मुर्ख लिख दिया और स्वामी जी को दे दिया फिर स्वामीजी ने मुर्ख लिखा हुआ पढ़ा और वापस शिक्षक के पास गए और कहा आपने हस्ताक्षर तो कर दिए मुर्ख लिख कर पर आपने मुझे गुण तो दिए ही नहीं इसमें गुण भी लिख दीजिये इतने तेज थे हमारे स्वामी विवेकानंद |
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